Monday, April 13, 2009

पानी के बगैर भयावह तस्वीर

एक पुरानी कहावत है...बिन पानी सब सून! जिस किसी ने भी इस कहावत की रचना की होगी, वह बड़ा दूरदर्शी रहा होगा। उसे इस बात की आशंका रही होगी कि मानव इस दुनिया को बहुत जल्दी तबाह कर देगा और तब पानी की मारामारी मचेगी। सहज रूप से उपलब्ध पानी खत्म हो जाएगा तो जिंदगी की कल्पना मुश्किल होगी। इसीलिए बनी होगी यह कहावत! यह कहावत हर कोई जानता है लेकिन किसी ने भी शायद इसका अर्थ समझने की कोशिश नहीं की। मानव ने जंगल उजाड़ दिए, नदियों को कचरा घर बना दिया। उदï्गम स्थलों को तबाह कर दिया। लाखों की संख्या में तालाब मर गए और नदियों का प्रवाह खत्म होने लगा। जो लोग आज पचास साल के हैं, उन्होंने अपने बचपन की भरी गर्मियों में भी गंगा और नर्मदा जैसी नदियों में भरपूर और स्वच्छ निर्मल पानी बहते देखा होगा लेकिन आज की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गर्मी में गंगा की धारा कई जगह दिखती नहीं है और नर्मदा में इतना कम पानी हो जाता है कि पाट सिकुड़ जाते हैं। इनकी सहायक नदियों में तो प्रवाह बस बारिश के दिनों में ही देखने को मिलता है, सर्दियों में प्रवाह ठहर जाता है और गर्मियों में ये नदियां लगभग सूख जाती हैं। जंगलों के कटने, तालाबों के मरने और नदियों के आहत होने की वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। बीस साल पहले जिन क्षेत्रों में डेढ़ सौ फीट की गहराई में अच्छा पानी मिल जाता था, वहां अब पानी ढ़ाई तीन सौ फीट की गहराई में ही नसीब होता है। मध्यप्रदेश के कई शहरों में पांच से छह सौ फीट की खुदाई के बाद भी पानी मिलना मुश्किल ही होता है। कहने का आशय यह है कि हमारी कारगुजारियों की वजह से पानी लगातार हमसे दूर होता जा रहा है। मध्यप्रदेश के न केवल कई शहर बल्कि ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में भयंकर जलसंकट व्याप्त है। जिस उज्जैन शहर में कभी पूण्य सलीला क्षिप्रा बहा करती थी, वहां पानी के लिए हाहाकार मचा है। लोगों का तीन-चार दिन में एक बार पानी नसीब हो रहा है। प्रकृति के प्रति हमारी कारगुजारियों का ही नतीजा है कि अब पानी बोतलबंद होकर बिक रहा है...और खूब बिक रहा है। पचास साल पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पानी में बोतलों में भरकर बिकेगा! बोतलबंद पानी की कीमत अभी दूध के मुकाबले आधी है लेकिन अब यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि अगले पचास सालों में पानी की कीमत शायद दूध से भी ज्यादा हो जाए! पानी की इस कमी के कारण हमारा पूरा जनजीवन प्रभावित हो रहा है। सदियों से छककर होली खेलने वाले पहले सूखी होली और अब केवल तिलक होली के करीब आ गए। सीधे शब्दों में कहें तो पानी की कमी ने रंगों के त्यौहार को औपचारिकता में बदल दिया। यदि हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं किया होता शायद यह दिन हमें नहीं देखना पड़ता। मजबूरी भरी एक कहावत है कि जब जागो तभी सवेरा। चलिए इस कहावत को भी स्वीकार कर लें तो अभी से पानी की बचत और पर्यावरण की सेहत सुधारने में हम सभी को जुट जाना चाहिए। जंगलों के प्रति हमारा दर्दनाक व्यवहार खत्म होना चाहिए। भूमि के जलस्तर को सहेजने में इनकी बड़ी भूमिका होती है। अपनी जिंदगी बचानी है तो नदियों को भी बचाना होगी। बड़ी विचित्र बात है कि मानव दूसरे ग्रहों पर पानी की मौजूदगी की संभावना तलाश रहा है ताकि वहां जीवन बसाने के बारे में सोचा जा सके और दूसरी ओर पृथ्वी को बिन पानी करने पर तुला हुआ है। वाकई स्थिति बहुत गंभीर है। विकास मिश्र

6 comments:

  1. धूप हवा पानी पर हक सबका है
    दो दिन की जिन्दगानी पर हक सबका है
    कविता या गज़ल में हेतु मेरे ब्लॉग पर आएं
    http://gazalkbahane.blogspot.com/ कम से कम दो गज़ल [वज्न सहित] हर सप्ताह
    http:/katha-kavita.blogspot.com/ दो छंद मुक्त कविता हर सप्ताह कभी-कभी लघु-कथा या कथा का छौंक भी मिलेगा
    सस्नेह
    श्यामसखा‘श्याम’

    ReplyDelete
  2. विकासजी
    विषय बढ़िया है चेतना भी जरूरी है। और, इसके लिए सीधे कुछ ऐसा दृष्टांत लेकर लिखिए-बताइए जिससे कुछ लोगों पर इसका सकारात्मक असर करे। खाली ज्ञान से बात न बन पाएगी।

    ReplyDelete
  3. आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं.
    Pawan Mall
    http://latife.co.nr/

    ReplyDelete
  4. चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है आपके लेखन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं ...........

    ReplyDelete
  5. इसके लिये बून्द-बून्द पानी बचाना है इसी कामना के साथ बधाई।

    ReplyDelete