Monday, April 13, 2009
अंधेरे बंद कमरे का दर्द
पिछले सप्ताह दो खबरें ऐसी आई जिन्होंने दिलो-दिमाग को झंकझोर कर रख दिया। समझ में नहीं आ रहा है कि आधुनिकता की ओर तेजी से दौर रहे विश्व समाज में आबादी के कुछ हिस्से के साथ इस तरह का अत्याचार कब तक होता रहेगा? ...और दुनिया कब तक चुप बैठी रहेगी? पहली खबर वीडियो फुटेज के साथ आई। दुनिया ने देखा कि किस तरह पाकिस्तान के स्वात घाटी में १७ साल की एक लड़की के जिस्म पर तालिबाननियों ने तड़ातड़ कोरे बरसाए। उस लड़की की चीख सुनकर तालिबानियों के खिलाफ खून खौल जाना किसी के लिए भी स्वाभाविक ही कहा जाएगा! तालीबान के इस खौफनाक चेहरे से दुनिया परिचित है इसलिए सभ्य समाज उससे नफरत करता है। ...लेकिन दुनिया के सामने फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि तालिबान को खदेड़े जाने के बाद अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान की कुर्सी पर बैठाए गए हामिद करजई जो कर रहे हैं, वह क्या तालिबानी मानसिकता से प्रेरित नहीं है? दरअसल करजई सरकार ने एक नया कानून तैयार कर लिया है और बहुत जल्दी वह अमल में भी आने वाला है। यह कानून कहता है कि महिलाएं बगैर किसी 'वैध कारणÓ के अपने घर से बाहर नहीं निकल सकती हैं। वे वैध कारण क्या-क्या होंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है लेकिन कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि यदि कोई महिला घर से बाहर निकलती है तो उसे रोककर कारण पूछा जा सकता है कि कहां जा रही हो? घर से बाहर निकलने के कारण को अवैध बताकर उसे सजा भी दी जा सकती है। जाहिर है कि इस तरह का कानून महिलाओं को भयभीत करेगा और वे घर से बाहर निकलने के पहले दस बार सोचेंगी। कुछ इसी तरह का कानून तालिबान के राज में भी था। स्वात घाटी में जिस लड़की के जिस्म पर ३४ कोड़े बरसाए गए, उसका कसूर केवल इतना था कि वह अपने पति के साथ नहीं बल्कि दूसरे व्यक्ति के साथ बाहर निकली थी।सवाल उठना स्वाभाविक है कि करजई सरकार और तालिबान में क्या फर्क रह गया है? महिलाओं को इस तरह अंधेरे बंद कमरे में समेट देना वाकई असभ्यता की बड़ी मिसाल है और दर्द इसलिए ज्यादा हो रहा है, क्योंकि यह कानून कोई सिरफिरा तालिबानी नहीं लागू कर रहा है बल्कि करजई नाम का वह व्यक्ति लागू करने जा रहा है जो काफी पढ़ा लिखा है और जिससे अफगानिस्तान ने काफी उम्मीदें लगा रखी हैं। उम्मीद की जा रही थी कि करजई नाम का यह अफगानी राष्ट्राध्यक्ष तालिबान के खौफ में घुट-घुट कर दशक भर तक मरने वाली इन महिलाओं का दर्द समझेगा, उन्हे आजादी की हवा मुहैया कराएगा लेकिन इस आदमी ने तो उन्हें अंधेरे बंद कमरे की ओर धकेलने की तैयारी कर ली है। जरा सोचिए कि घर की चाहरदिवारी में कैद वो महिलाएं मुल्ला ऊमर और करजई में क्या फर्क कर पाएंगी?इस कानून के कुछ प्रावधानों पर और गौर कीजिए! प्रस्तावित कानून कहता है कि अपने पति की इजाजत के बगैर कोई भी महिला नौकरी नहीं कर सकती। तलाक की स्थिति में उसे पति की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा लेकिन पति को पत्नी की संपत्ति में हक दिया जाएगा। वाकई अजीब कानून है। ऐसा लगता है कि जैसे महिलाओं पर जुल्म ढ़ाने के लिए ही यह कानून लाया जा रहा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने भी करजई के इस कानून की निंदा की है लेकिन आशा की ऐसी कोई किरण नजर नहीं आ रही है जो यह दिलासा दे सके कि करजई इस कानून को लागू नहीं करेंगे। अफगानिस्तान में आमचुनाव नजदीक हैं और ऐसे में करजई पुरुषों का वोट हासिल करने के लिए इस तरह का बेदिमागी कानून लागू कर सकते हैं। अफगानिस्तान में महिलाएं वैसे भी वोट देने ज्यादा नहीं जातीं कि करजई उनकी फिक्र करें! ...और अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति ऐसी है नहीं कि वे विरोध के स्वर भी उठा सकें। ऐसी स्थिति में दुनिया के सभ्य देशों में निवास करने वाले लोगों का दायित्व बनता है कि हर तरह से करजई के कानून का विरोध करें। अपनी सरकार पर दबाव डालें कि वे अफगानिस्तान की महिलाओं की रक्षा के लिए आगे आए। सभ्य कहलाने वाली इस दुनिया में अब किसी को भी महिलाओं पर बर्बरता की इजाजत नहीं दी जा सकती। ...लेकिन महिलाओं के अधिकार को लेकर दुनिया अभी उतनी सचेत नजर नहीं आती जितनी उसे नजर आनी चाहिए। विकसित देशों में कानूनी रूप से महिलाओं को समानता का अधिकार हासिल तो है लेकिन सामाजिक रूप से अभी भी वे दोयम दर्जे की मान्यता ही रखती हैं। सभ्यता के विकास के साथ महिलाओं की स्थिति में कुछ परिवर्तन आया है, आजादी की कुछ खुली हवा उन्हें मिली है लेकिन ज्यादातर स्थिति अभी भी गुलामी वाली ही है। बर्बर सोच वाले लोगों के लिए महिला उनकी शारीरिक भूख शांत करने और बच्चा पैदा करने की मशीन के अलावा कुछ नहीं है। कुछ जाहिल समाज महिलाओं को गुलाम बनाए रखने की चीज मात्र समझता है। ऐसी आदिम और असभ्य सोच रखने वाले लोगों को यह भी याद नहीं रहता कि उनकी मां भी एक महिला ही है जिसने उन्हें जन्म दिया। प्रत्यक्ष तौर पर तो मां को ही भगवान का दर्जा हासिल है। क्या कोई अपने भगवान के साथ इस तरह का व्यवहार कर सकता है? यह सवाल उन जाहिलों से पूछा जाना चाहिए...लेकिन जाहिलों से सवाल पूछकर आप करेंगे भी क्या? वे सभ्यता की भाषा तो जानते नहीं हैं। वे केवल कोड़े और गोली-बंदूक की भाषा जानते हैं। उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब भी देना पड़ेगा। ...और सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि इस असभ्यता और बर्बरता के खिलाफ दुनिया भर की महिलाएं एकजुट हों और करजई तक संदेश पहुंचाएं कि तुम तालिबानी मत बनो!
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प्रिय बन्धु
ReplyDeleteबहुत अच्छा लगा आपका लेखन
आज कल तो लिखने पढने वालो की कमी हो गयी है ,ऐसे समय में ब्लॉग पर लोगों को लिखता-पढता देख बडा सुकून मिलता है लेकिन एक कष्ट है कि ब्लॉगर भी लिखने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जबकि पढने पर कम .--------
नई कला, नूतन रचनाएँ ,नई सूझ ,नूतन साधन
नये भाव ,नूतन उमंग से , वीर बने रहते नूतन
शुभकामनाये
जय हिंद
i am really thankful to you for such agreat article,which shattered the whole idea of humanity.please countinue so that people will be make awared and forced to think about, what is happing in world?
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