Tuesday, May 12, 2009

मर्ज उनका परेशान हम

बड़ी पुरानी कहावत है कि आपका पड़ोसी यदि दुखी है तो आप सुकून में नहीं रह सकते। हिंदुस्तान पर यह कहावत पूरी तरह फिट बैठती है। हमारा हर पड़ोसी किसी न किसी तरह के गंभीर संकट से गुजर रहा है और निश्चय ही भारत पर इसका बुरा असर भी पड़ रहा है। चिंताजनक और आश्चर्य की बात है कि इन सारे प्रकरणों में भारत की भूमिका सार्थक और सतर्क दिखाई नहीं दे रही है। चलिए पहले पड़ोसियों की समस्याओं पर नजर डालते हैं। पहले क्रम पर हम पाकिस्तान को रख सकते हैं जो फिलहाल बुरी तरह आतंकवाद का खुद शिकार हो चुका है और इसका खामियाजा भी भुगत रहा है। अफगानिस्तान को जर्जर करने वाले जिस तालीबान को उसने पाला पोसा और तंदुरुस्त बनाया, वही तालीबान उसकी धरती पर न केवल अपनी जड़ें जमा चुका है बल्कि पाकिस्तानी फौज तक से लोहा ले रहा है। वास्तविक स्थिति यही है कि पाकिस्तान इस वक्त सबसे गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है और उसका वजूद खतरे में पड़ गया है। हालांकि तालीबान से लेकर दूसरे सभी आतंकवादी समूहों को पालने-पोसने के पीछे पाकिस्तान का मंसूबा यही रहा कि इन आतंकवादियों के माध्यम से वह भारत की धरती पर तबाही का मंजर पैदा करे। सीधे रूप से भले ही पाकिस्तान सरकार ने कुछ नहीं किया हो लेकिन उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई की करतूत सामने आ चुकी है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और पाकिस्तानी सेना के संबंध आतंकवादियों से रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। भारतीय संसद पर हमले का मामला हो, मुंबई में सीरियल बम ब्लास्ट हो या फिर ताज, नरीमन बिल्डिंग या सीएसटी पर हमला, सभी में पाकिस्तानी हाथ थे लेकिन हिंदुस्तान ने उन हाथों को मरोडऩे की कभी कोशिश नहीं की। दरअसल पाकिस्तान के संदर्भ में भारत का रवैया हमेशा ढुलमुल ही रहा है। १९७१ के बाद उसे कभी भी हमने उसकी औकात दिखाने की कोशिश नहीं की। हर वक्त पर भारत ने कमजोरी का परिचय दिया। भारतीय संसद पर हमले के दोषी अफजल को अभी भी फांसी पर नहीं लटकाया जा सका है। मुंबई पर हमले के मामले में हम पाकिस्तान का कुछ हीं बिगाड़ सके! यदि हमने उसी वक्त पाक अधिकृत कश्मीर पर हमला बोल दिया होता और आतंकवादियों का आसरा नष्ट कर दिया होता तो आज स्थिति बिल्कुल अलग होती। ...लेकिन हम ऐसा कुछ नहीं कर पाए। केवल जुबानी जमाखर्च करते रहे। दूसरे पड़ोसी और कभी पाकिस्तान का हिस्सा रहे बांग्लादेश की स्थिति से हम सभी परिचित हैं। जहां की बहुसंख्यक आबादी बंगला बोलती है और जिसे हिंदुस्तान ने आजादी दिलाई वह हमारे लिए खतरा बन चुका है। आतंकवादियों को बांग्लादेश से भी मदद मिलती है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। सवाल यह उठता है कि भारत की बदौलत आजादी प्राप्त करने वाले बांग्लादेश को तो तो भारत का शुक्रगुजार होना चाहिए था, फिर ऐसा क्या हो गया कि वह हमारा शत्रु बन बैठा? इसका जवाब सीधे तौर पर किसी के पास नहीं है लेकिन यह तो स्पष्ट होता ही है कि बांग्लादेश के संदर्भ में कहीं न कहीं हमारी विदेश नीति में चूक हुई। बांग्लादेश के संदर्भ में एक बात और ध्यान देने योग्य है। हमारा यह पड़ोसी आर्थिक विपन्नता का शिकार है और यही कारण है कि लाखों की संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए हमारे देश में आ चुके हैं। दुर्भाग्य है कि हिंदुस्तान के राजनेता इस मामले में भी राजनीति करते हैं, उन्हें वोट बैंक नजर आता है और वे बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने की बात तक नहीं करते हैं। ये घुसपैठिए पूरे हिंदुस्तान में फैल चुके हैं। बहुतों के तो राशनकार्ड और वोटर आईडी कार्ड तक बन चुके हैं। इन बाग्लादेशी घुसपैठियों के बल पर कई राजनेता भारतीय राजनीति में अपनी रोटी भी सेंक रहे हैं। तीसरा पड़ोसी चीन जरा अलग किस्म का है। उसकी खुद की कोई बड़ी समस्या नहीं है लेकिन हमारे लिए वह बड़ी समस्याएं पैदा कर रहा है। भारतीय बाजार में जितना कचरा उसने भरा है, उतना दुनिया के दूसरे सभी देश मिलकर भी नहीं भर पाए हैं। भारतीय बाजार को उसने बुरी तरह प्रभावित किया है। उसके घटिया माल पर दुनिया के विकसित देशों ने प्रतिबंध लगा दिया लेकिन हिंदुस्तान का रवैया इस मामले में कभी सख्त नहीं रहा। इसके लिए हम अपनी सरकारों को नहीं तो और किसे दोषी ठहराएं? चौथे पड़ोसी श्रीलंका में लिट्टे और सरकार के बीच का संघर्ष सीधे तौर पर हमें प्रभावित कर रहा है और भारतीय राजनीति में उसका भूचाल भी इस चुनाव में महसूस किया गया। इसी संघर्ष के कारण हम अपना एक प्रधानमंत्री भी खो चुके हैं। ...और अब मामला नेपाल का। बस कुछ साल पहले तक नेपाल हमारा भरोसेमंद साथी था लेकिन माओवादियों के सत्ता में आते ही भारत से रिस्ते सामान्य नहीं रह गए हैं। नेपाली माओवादी जाहिर तौर पर चीन के प्रभाव में हैं और भारत के लिए यह खतरे की बड़ी घंटी है। भारत और नेपाल के बीच इतनी बड़ी खुूली सीमा है कि वहां किसी तरह का अंकुश लगा पाना लगभग असंभव जैसा काम है। आज भी आतंकवादियों और उग्रवादियों को मिलने वाले हथियार की बड़ी खेप नेपाल के रास्ते ही भारत पहुंचती है। ...तो सवाल उठता है कि भारत क्या करे? इसका जवाब यह है कि सभी पड़ोसियों के संदर्भ में भारत की एक स्थाई और दूरगामी नीति होनी चाहिए। ऐसी नीति के लिए जरूरी है कि देश में राजनीतिक स्थिरता हो। कम से कम विदेश नीति के संबंध में सभी राजनीतिक दलों के बीच मतैक्य हो। दुर्भाग्य से न तो राजनीतिक स्थिरता है और न ही मतैक्य। सभी दल वोट की राजनीति में लगे हैं...देश की फिक्र किसी को नहीं!

2 comments:

  1. आपका आलेख पढ़कर रहीम की दो पंक्ति याद आ गयी-
    रहत कुसंग सोचत कुशल, यह रहीम अफसोस
    महिमा घटी समुद्र की रावण बसत पड़ोस
    आपने जो सवाल उठाया है उसका जवाब हमारे नीति-निर्माताओं के पास नहीं है। मुझे लगता है कि अब हमारा देश उस दौर में दाखिल हो गया है जब मुल्क की विदेश नीति भी वोट बैंक की राजनीति के गिरफ्त में आ गयी है। चाहे पाकिस्तान हो या बांग्लादेश या फिर नेपाल; भारत की कुटनीति हर जगह पर या तो फेल है या फिर ढुलमुल है। यहां तक कि अब भारत की बात नेपाल भी नहीं सुनता जो भारत के सहयोग के बगैर एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता है।
    हमारे नेता सोचते हैं कि ये सब चलते रहता है और चलते रहेगा। लेकिन हमारे पड़ोस में जो कुछ हो रहा है उसका असर भुक्तभोगी देशों से ज्यादा भारत पर ही पड़ेगा। क्योंकि भारत भौगोलिक-सामाजिक-आर्थिक और सामरिक तौर पर न तो पाकिस्तान है और न बांग्लादेश और न ही नेपाल। अगर नेपाल चीन की गोदी में बैठ गया तो भारत के लिए नक्सलवाद के विषाणु पर नियंत्रण पाना नामुमकिन हो जायेगा। अगर बांग्लादेश स्थिर नहीं हुआ तो पूर्वोतर भारत की सामाजिक-आर्थिक और डेमोग्रैफिक तस्वीर पूरी तरह बदल जायेगी, जिसे दोबारा ठीक करना संभव नहीं हो पायेगा। पाकिस्तान के भूत का तो असल निशाना भारत ही है। जम्मू-कश्मीर में जो हम झेल रहे हैं वह पाकिस्तान का ही भूत है। अगर पाकिस्तान में पाकिस्तानी भूत का शासन या डोमिनेंसी हो गया तो इसमें कोई संदेह नहीं कि कश्मीर की जानिब से एक अफगानिस्तान भारत में प्रवेश कर जायेगा।
    हमारा दुर्भाग्य है कि हम न तो छोटे देश हैं और बड़े देश होकर भी हमारी नीति बड़ी व दूरदृष्टि वाली नहीं है। बड़े शरीर के मालिकों को अच्छी खुराक और नियमित व्यायाम की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में वह समय से पहले ही बूढ़ा होकर धाराशायी हो जाता है। पता नहीं यह बात देश के राजनीतिज्ञों और नीति-निर्माताओं की समझ में क्यों नहीं आती।
    आपका आलेख आंख खोलने वाला है। आशा और दुआ करता हूं कि इसे वे भी पढ़ेंगे जिन्हें इस मुद्दे पर सोचने और काम करने के लिए देश वेतन और सुविधा दे रहा है।
    धन्यवाद
    रंजीत

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