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Sunday, May 24, 2009
बेशर्मी की हद हो गई!
चुनाव परिणाम आने के बाद देश ने राहत की सांस ली थी कि बहुत दिनों बाद एक स्थिर सरकार की उम्मीद बंधी! यहां तक कि राजनीति में कांग्रेस के विरोधी भी इस बात को लेकर सुकून में थे कि अब क्षेत्रिय क्षत्रप कुछ शांत रहेंगे और सरकार को ब्लैकमेल नहीं कर पाएंगे। कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन नहीं होने के बावजूद जिस तरह से माया, मुलायम और लालू ने बिन मांगे समर्थन देने की घोषणा कर दी, उससे उम्मीद को बल मिला कि ब्लैकमेलरों का जमाना लद रहा है। ...लेकिन करुणानिधि ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया! यूपीए गठबंधन को लेकर कांग्रेस को भरोसा था कि जो साथ हैं, वे कुछ भी ऐसा नही करेंगे जिससे यूपीए को लेकर जनता के बीच गलत संदेश जाए। इसीलिए कांग्रेस ने गठबंधन के साथियों के बीच मंत्रीपद बंटबारे का एक फार्मुला तैयार किया ताकि किसी को कोई शिकायत नहीं रहे। दूसरे दल तो मान गए लेकिन करुणानिधि बिफर पड़े। सीधे तौर पर कुछ नहीं बोले लेकिन अपनी हरकतों से देश को बता दिया कि राजनीति में उनका सरोकार अपने परिवार को चमकाने के अलावा और कुछ नहीं है। उन्हें अपने कुनबे के सभी सदस्यों के लिए मलाईदार महकमा चाहिए! क्षेत्रवादी क्षुद्रता के शिकार तो वे काफी पहले से ही हैं। बड़े राजनीतिक ब्लैकमेलर की भूमिका भी उन्होंने अपने लिए तय कर ली। करुणानिधि के बेशर्म हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने कांग्रेस को तब ब्लैकमेल करने की कोशिा की है जब जनता ने लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और शिबू सोरेन जैसे लोगों को हैसियत बता दी है। लगता है अपने क्षेत्रों में थोड़ी बहुत सफलता पाने वालों ने लालू, पासवान और सोरेन की दुर्गति से कोई सीख नहीं ली है। यदि ऐसा होता तो करुणानिधि ब्लैकमेलिंग की हिम्मत नहीं करते। वैसे केवल करुणानिधि को ही दोषी क्यों ठहराएं? नेशनल कान्फ्रेंश के अब्दुल्ला पिता-पुत्र और ममता बैनर्जी भी कहां कम हैं? ममता बैनर्जी ने हालांकि खुले तौर पर कुछ भी नहीं कहा लेकिन यह बात तो सार्वजनिक हो ही गई कि रेल मंत्रालय पाने के लिए उन्होंने दबाव का इस्तेमाल किया। चूंकि पश्चिम बंगाल में ममता ने 'लाल किलेÓ को अभी-अभी क्षतिग्रस्त किया है इसलिए कांग्रेस उनकी हर बात मानने को तैयार है। कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में एक ऐसे सहयोगी की जरूरत है जो वहांं के लाल मिथक को तोड़ सके। यही कारण है कि ममता को बिना किसी परेशानी के रेल मंत्रालय मिल गया। गौर कीजिए कि ममता रेल मंत्रालय को लेकर ही ज्यादा उत्सुक क्यों थीं? दरअसल रेलवे एक ऐसा विभाग है जहां हर साल बड़ी संख्या में नौकरी की संभावनाएं मौजूद रहती हैं और वास्तविकता यही है कि जो मंत्री होता है, वह इन संभावनाओं का खूब दोहन भी करता है। रेल मंत्री अपनी मर्जी के मुताबिक अपने क्षेत्र में नई रेल गाडिय़ां और परियोजनाओं की स्थापना करता है जैसा कि रामविलास पासवान और लालू प्रसाद यादव ने अपने जमाने में किया। ममता को मालूम है कि पश्चिम बंगाल में आने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान यह मंत्रालय उनके काम आ सकता है। अब सवाल पैदा होता है कि मनमुताबिक मंत्रालय मिलने के बाद ममता क्यों बिफर पड़ीं? दरअसल उन्हें यह डर सताने लगा कि कहीं बाद में कांग्रेस धोखा न कर दे और अपने सहयोगियों के लिए जो मलाईदार मंत्रालय वे चाह रही हैं वह न मिले! यदि ऐसा हो गया तो वे कुछ कर नहीं पाएंगी इसलिए उन्होंने यह कह दिया कि जब तक उनके सहयोगियों को मंत्रीपद नहीं मिल जाता तब तक वे अपना मंत्रालय नहीं संभालेंगी। वास्तव में यह दबाव की राजनीति ही है। कांग्रेस की स्थिति ऐसी है कि सबसे ज्यादा सीट जीतने के बावजूद उसे अपने सहयोगियों के साथ कहीं न कहीं समझौता करना पड़ रहा है। जरा सोचिए कि यदि मुलायमसिंह, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान जैसे लोग भी इस समय ब्लैकमेल करने की स्थिति में होते तो क्या होता! ऐसी स्थिति में इस देश के आम आदमी के मन में यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या हमारे देश के नेता इतने स्वार्थी हो गए कि हर किसी को मलाईदार महकमा ही चाहिए? जितने भी नेता हैं, वे जनता के सामने यही कहते हैं कि राजनीति में देश सेवा के लिए आए हैं लेकिन हकीकत इसके ठीक विपरीत लगती है। यदि विभागों का बंटबाड़ा प्रधानमंत्री केअधिकार क्षेत्र की बात है तो किसी भी सहयोगी दल को उन्हें ब्लैकमेल करने का अधिकार नहीं होना चाहिए और होना तो यह चाहिए कि कोई नेता यदि इस तरह की ब्लैकमेल की राजनीति करे तो प्रधानमंत्री को साफ शब्दों में कह देना चाहिए कि अपनी औकात में रहो अन्यथा देश की जनता को सबकुछ साफ-साफ बता दिया जाएगा। ...लेकिन किसी भी प्रधानमंत्री से ऐसी हिम्मत की केवल कल्पना की जा सकती है। गठजोड़ की राजनीति में ब्लैकमेल हो जाना मजबूरी है। देश ऐसी मजबूरी से अभी तक पूरी तरह उबरा नहीं है। ...तो बड़ा सवाल यह है कि क्या किया जाना चाहिए? राजनीति की अपनी मजबूरी हो सकती है लेकिन जनता चाहे तो इस तरह के ब्लैकमेल की राजनीति के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर सकती है। कल्पना कीजिए कि देश भर से यदि एक लाख लोग किसी ब्लैकमेलर राजनेता को धिक्कार भरी चिठ्ठी भेजते हैं तो उस पर कुछ न कुछ तो असर होगा ही। अभी चूंकि हर ऐसे ब्लैकमेलर को यह पता होता है कि जनता की ओर से कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं होगी और अगला चुनाव आने तक जनता शायद उनकी हरकतों को भूल चुकी होगी, इसीलिए वे बेशर्मी के साथ मलाईदार महकमा लूट लेना चाहते हैं। जाहिर है कि इस तरह की राजनीति का चौतरफा विरोध होना चाहिए। राजनेताओं से कहा जाना चाहिए कि अपने स्वार्थ की आग में देश को मत जलाईए!
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