Wednesday, February 18, 2009

एक अनशन जरा अलग किस्म का
दिल्ली में धरना, प्रदर्शन और अनशन कोई अनोखी बात नहीं है। धरना देने के लिए तो सरकार ने एक सड़क भी निर्धारित कर रखी है जहां देश भर से लोग आते हैं, अपना तंबू लगाते हैं और भरपूर भड़ास निकालते हैं। इस मार्ग पर कई तंबू तो वर्षों से लगे हैं। इसी भीड़ में पिछले एक महीने से जी.डी. अग्रवाल नाम का एक इनसान 'एक बड़ी मांग को लेकर अनशन पर बैठा हुआ है। यह मांग है पवित्र नदी गंगा को बचाने की दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबारों में अग्रवाल और उनकी मांग को थोड़ी बहुत जगह मिलती रही है लेकिन इतनी जगह नहीं मिली कि खबर बड़ी बन सके ।चूंकि इस खबर में कोई मसाला नहीं है इसलिए इलेक्ट्रानिक मीडिया की भी कोई खास दिलचस्पी नहीं जगी। एक्का दुक्का चैनलों ने थोड़ा सा कवरेज किया और बात समाप्त हो गई। नतीजा है कि देश के सामान्य लोगों के बीच जीडी अग्रवाल की चर्चा अभी शुरु नहीं हो पाई है। अग्रवाल ने यदि अपने अनशन स्थल पर देश एक दो फिल्मी हस्तियों को बुलाने का जुगाड़ कर लिया होता तो उन्हें इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ओर से भरपूर कवरेज मिल जाता और देश के सामान्य लोगों तक वे अपनी बात पहुंचा चुके होते। लगता है कैमरे को अपनी ओर मोडऩे की कला जीडी अग्रवाल को नहीं आती। कुछ नहीं तो अमरसिंह को ही बुला लेते। अमरवाणी को हर चैनल कवर करता है । चलिए, यह जानते हैं कि यह पूरा मामला क्या है! जीडी अग्रवाल पर्यावरणविद हैं और गंगा को लेकर चिंतित हैं। देश भर में गंगा मैली तो हो ही रही है, ज्यादा चिंता कि बात यह है कि गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी के १२५ किलो मीटर कि दूरी के बीच गंगा का प्रवाह संकट के घेरे में आ गया है। यहां टिहरी बांध बना है जिसे रोकने के लिए सुंदरलाल बहुगुणा ने बहुत कोशिश कि लेकिन सरकारी डंडे के आगे न कभी किसी की चली है और न चलती है! जीडी अग्रवाल ने बहुत मौंजू सवाल उठाया है कि गंगा को सरकार ने राष्ट्रीय नदी का दर्जा तो दे दिया लेकिन इसके प्रवाह को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही है। गंगा सफाई से लेकर गंगा संरक्षण तक जितनी भी योजनाएं चल रही हैं वे सभी कागजों पर हैं और भरपूर कि बंदरबांट हो रही है। अग्रवाल के साथ वाराणसी की गंगा महासभा भी है जिसका गठन पंडित मदन मोहन मालवीय ने किया था। आश्चर्य की बात है कि बिल्कुल अलग तरह के इस अनशन पर भी सरकार कुछ खास ध्यान नहीं दे रही है। सरकार ने अग्रवाल को यह भरोसा जरूर दिलाया है कि गंगा पर अब कोई बांध नहीं बनेगा लेकिन यह नहीं बताया कि जिन के कारण गंगा संकट में आ गई है, उनका क्या किया जाएगा। ...तो क्या इस अनशन का भी वही हश्र होगा जो सामान्य तौर पर दूसरे अनशनों का होता है? लगता तो ऐसा ही है क्यों कि नदियों के प्रति जब तक सामान्य जन का व्यवहार नहीं बदलेगा तब तक सरकार पर दबाव भी नहीं बनेगा। नदियों के प्रति सामान्य जन का व्यवहार बडी अजीबो-गरीब है। वह नदियों के प्रति श्रद्धा तो रखता है और उनके चिरायु होने कि कामना भी करता है लेकिन हकीकत यह भी है कि नदियों में कचरा भी वही डालता है, नदी किनारे के जंगलों का सफाया भी वही करता है। ऐसी स्थिति में सूरत बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सुकून की बात यह है कि चारों पीठों के संक्रचार्य ने जीडी अग्रवाल के आंदोलन के साथ अपने स्वर मिलाए हैं। यदि संक्रचार्य एकजुट होते हैं तो मीडिया का ध्यान भी इस मुद्दे पर केंद्रित होगा और सरकार पर दबाव के साथ जनजागरण की उम्मीद भी की जा सकती है।
विकास मिश्र